Chhogalal jiChhogala Lal ji is the founder of Chhogalal Construction Company Pvt. Ltd and associate Construction Companies. Here is the success story of Chhogala Lal ji, how he formed and established the Construction Company.
The history is from the beginning of the Construction work where he started building construction business and later on by his motivational work and inspiration he forwarded towards the next step of success. And after few years of the establishments he become the leader in construction sector of India.
Chhoga Lal ji explained the background and history in his own words and feelings with work dedication and the factor behind success that is the spiritual power. His work spirit and the work with the quality based construction was the additional qualification behind the success of his civil construction entrepreneurship. So due to the qualification and dedication he established and setup standard national level Construction Company.

 

बाबा ने मुझे हिम्मतवान बना दिया

ब्र. कु. छोगालाल, उदयपुर
छोगालाल भाई जी को अव्यक्त बापदादा की दिव्य अलौकिक वरदानों की पालना का करीब 15 साल से सौभाग्य प्राप्त हुआ है। आपकी अनेक विशेषतायें व गुणों को देख स्वयं बापदादा की प्रेरणा से ही दादी जी ने शान्तिवन के भवन निर्माण की जिम्मेवादी का ताज आपको दिया है। इस शान्तिवन को मंगलमय बनाने के कार्य में आपके साथ विश्व की सर्व ब्राह्मण आत्माओं की शक्ति स्थूल व सूक्ष्म सहयोग से जुटी हुई है।
मेरा जन्म एक प्राकृतिक सौन्दर्य से सुसज्जित अरावली पर्वत के श्रृंखलाओं के बीच ऐतिहासिक स्थल राजस्थान के उदयपुर जिले में, सन् 1940 में हुआ। बचपन से पढ़ाई में बहुत रुचि थी, परन्तु माता-पिता की आर्थिक परिस्थिति अत्यंत विकट होने के कारण रुचि होते हुए भी पढ़ाई पढ़ नहीं सका। 15 साल की आयु में ही रोजगारी के कार्य में जुट गया। वह दिन मानस-पटल पर उभर जाता है जब रोजगारी करने के लिए 7-8 कि.मी. पैदल जाना पड़ता था। यह परिस्थिति देखकर हमारे पिता जी ने 21 रुपये में साइकिल खरीदकर दी। करीब 5 साल रोजगारी करने के बाद सन् 1960 में रेलवे में नौकरी के साथ साथ साबुन बनाना, बूट पालिश के ब्रश बनाना, दुकानदारी करना, कभी जादू की अंगूठी खरीदकर जादू का खेल दिखाना आदि-आदि उद्योग करते रहे, लेकिन जीवन की एक महत्वाकांक्षा थी कि जीवन में मुझे कुछ करना है। बहुत आगे बढ़ना है चाहे उसके लिए कितना भी कष्ट क्यों न उठाना पड़े।
परिस्थिति बदल गई
8 साल रेलवे सेवा व बाकी कुटीर उद्योग करने के बाद सन् 1968 में हिन्दुस्तान जिंक लिमिटेड में एक बड़ा काम ठेके पर लिया जो उस समय वह 10 लाख का था। मजदूर को रु. 1.50 रोज दिया जाता था। अनेक समस्याओं की आंधी व परिस्थिति रूपी पहाड़ों को पार करते उस काम को हिम्मत व लगन से 18 महीने में पूरा करके दिया। इस काम में काफी अनुभव पाया। फिर वहां से ठेकेदारी का कार्य आरम्भ हुआ। फिर बिल्डिंग, रोड, तालाब बनाने का काम लिये, उसमें काफी फायदा हुआ। काम दिनोंदिन बढ़ता गया। सफलता भी मिलती रही। फिर उदयपुर, चित्तौड़गढ़ में बिरला कंसट्रक्शन का काम किया। जयपुर, जोधपुर और अन्य कई जगह कंस्ट्रक्शन चल रहा है। सन् 1980 में उदयपुर में पार्टनर (भागीदारी) के रूप में गैस सिलेंडर की फैक्ट्री खोली। फिर दोस्तों के संग का रंग मुझे लगा। उनका प्रभाव अति प्रभावशाली रहा। मैं शराब, मीट, सिगरेट आदि व्यसनों का गुलाम बन गया। लेकिन भाग्य को कुछ और ही मंजूर था। 2 मास के बाद ही आंखों पर लगी अंधकार की पट्टी दूर हो गई। जीवन को एक नई दिशा मिली।
अलौकिक सौभाग्य का सितारा चमका
एक दिन अपनी कार का कुछ काम कराना था। मैं उसे दुरुस्ती के लिए जिस गैरेज में ले जाता था वह भी मेरे दोस्त का था। लेकिन उस समय जब मैं गया तो उसके जीवन में काफी परिवर्तन देखा। वह सिगरेट, गुटखा आदि कुछ भी नहीं ले रहा था। मैंने उसके इस परिवर्तन का कारण पूछा, तब उसने कहा कि जब से मैं ब्रह्माकुमारी आश्रम में जा रहा हूं तब से ही यह परिवर्तन हुआ है। फिर उसने मुझे भी जाने के लिए कहा तो मैंने कहा हां क्यों नहीं। चार-पांच दिन के बाद आश्रम पर गये। वहां ब्र.कु.शील बहन (संचालिका) ने हमें संक्षिप्त रूप में विद्यालय का परिचय देकर दूसरे दिन से कोर्स करने के लिए बुलाया। शाम के समय 1 घण्टा निकालकर कोर्स करना शुरू किया। 4 दिन का कोर्स पूरा हुआ। ज्ञान बुद्धि में स्पष्ट हुआ। 5 वें दिन सेन्टर पर जाने लगा और माया की आंधी आनी शुरू हुई।
दोस्तों से समस्याओं का आना शुरू हुआ
जब 5 वें दिन सेन्टर पर जाना था, दोस्तों ने जाने के लिए रोका। इतना ही नहीं उन्होंने शाम के समय मुझे कमरे में बंद कर बाहर से ताला लगा दिया। लेकिन मुझे बार-बार सेन्टर की तरफ खींच होती थी। ज्ञान बहुत अच्छा लगा था। छठवें दिन मैंने सोचा अभी दिन में जाया करूंगा। जब उनलोगों को पता चला अभी छोगालाल दिन में जाने लगा है तो रात को बहन जी को फोन किया और बहुत उल्टी-सीधी गालियां दी। ऐसी अनेक बातें सुनाई, लेकिन हमारी टीचर इतनी मजबूत थी कि उन्होंने उस समय कुछ भी जवाब नहीं दिया। फिर दोस्तों की समस्या बढ़ती ही गयी, वह मुझे समझाते थे। हमारे पिताजी ने दादा लेखराज जी को देखा था, क्योंकि यह सभी सिंधी थे। इनके मन में सभी उल्टी बाते भरी हुई थी। सत्य इनसे बहुत दूर था। लेकिन मैंने सेन्टर पर जाना छोड़ा नहीं। आखिर बहन जी ने मुधुबन जाने का फार्म भरवा लिया। जाने की तिथि भी निश्चित हुई। दोस्तों को कहां से पता पड़ा कि मैं माउण्ट आबू जा रहा हूं। अभी ये तो इनका पक्का चेला बन गया। अभी दोस्ती खत्म होगी तो चलेगा, लेकिन हम इसको माउण्ट आबू जाने नहीं देंगे यह उन सबका निश्चय था। हम जिस दिन माउण्ट आबू के लिये 1 बजे उदयपुर से रवाना होने वाले थे। वह 1 बजे सेन्टर पर पहुंचे। हम चार भाई और बहन जी गाड़ी में बैठे थे। उन्होंने बहुत हंगामा किया। 1 घंटे तक बातें होती रही, आखिर मैं गाड़ी चलाने बैठा। मैंने गाड़ी चालू कि वह दो पीछे की सीट में बैठ गये। मैंने गाड़ी को सीधी माउण्ट आबू के लिये रवाना किया। 100 कि. मी. के आस-पास गाड़ी जाने के बाद पिंडवाड़ा में मैंने गाड़ी को रोका। वह गाड़ी से उतर गये और दो शराब की बोतल खरीदकर पीछे गाड़ी की डिग्गी में रख दी। मैंने कहा तुम यह सब क्या कर रहे हो, लेकिन वह एक ना माने। आखिर मैंने गाड़ी चालू की, रात को 8-10 बजे पाण्डव भवन पहुंच ही गये।
पाण्डव भवन पहुंचते ही गाड़ी के नीचे उतरे वहां कहने लगे तुम यहां रह नहीं सकते, हमारे साथ होटल में चलना पड़ेगा। बहन जी ने भी उन्हें बहुत समझाया, 1 घण्टे तक जिद्द चलती रही आखि रवह कहने लगा मैं वह हीरा हूं जो टूट नहीं सकता हूं, आखिर वह मुझे होटल में ले गये। रात को उन्होंने बहुत शराब पी और सो गये। मुझे बार-बार मधुबन की खींच होती थी। सुबह 4 बजे मैं स्नान आदि करके पाण्डव भवन पहुंचा तो गेट में ही शीला बहन मिली फिर उन्होंने सारा मधुबन दिया। क्लास, नाश्ता आदि करवाया। मैं 9.00 बजे फिर होटल में उनलोगों को मिलने गया तो वह रात को जैसे सोये थे वैसे ही स्थिति में सोये थे। मैं भी जाकर सो गया। उनलोगों की 11.00 बजे नींद खुली फिर वह स्नान आदि करके तैयार हुए। तीन दिन ऐसे ही प्रोग्राम चलता रहा। 4.00 से 9.00 बजे तक मुझे मधुबन जाना था। फिर घर जाने के दिन कहा बहन जी से पूछ कर जायेंगे। जब बहन जी से छुट्टी लेने गये और बहन जी ने कहा अभी तो आपका कोर्स मधुबन में ही पूरा हुआ आगे सेन्टर पर मुरली सुनने के लिए आना। वह कहने लगे तुमने कैसे कोर्स किया। फिर मैंने बताया तुम सोते थे तब मैं जागता था। यह सुनते ही आश्चर्य से हक्का-बक्का रह गये। फिर हम उदयपुर के लिए रवाना हुए। घर जाते ही सेन्टर पर मुरली सुनने जाने लगा।
यज्ञ सेवा करने का बाबा ने मौका दिया
बात 1993 की है, जब ज्ञान सरोवर का काम शुरू करना था, तब मधुबन के अशोक भाई गाबा जी मेरे पास आये और कहा – आपको मधुबन बुलाया है। मुझे बहुत खुशी हुई। फिर ज्ञान सरोवर की सारी सिमेन्ट की सड़के बनाने का काम मुझे मिला जो दादी जी सहित सभी को बहुत पसंद आया। उसके बाद जब इस साल शान्तिवन के निर्माण की बात बाबा ने कही तो यज्ञ के वरिष्ठ भाइयों का विचार चला यह काम किसको दिया जाए। 11 मार्च को एक भाई मेरे पास चिट्ठी लेकर आया और कहा –
आपको कल सुबह मधुबन पहुंचना है। मैं 12 मार्च को मधुबन आया। दादी जी ने कहा, कल सुबह नाश्ता करने के बाद मीटिंग भी है। प्रोग्राम के अनुसार मीटिंग में सभी वरिष्ठ भाई बैठे हुये थे। मेरे अंदर जाते ही दादी जी ने कहा आओ छोगालाल भाई तुम्हें मैं खुशी की बात सुनाती हूं। यह वाक्य सुनकर मुझे बहुत आनन्द हुआ। मैंने कहा कहो दादी जी क्या खुशी की बात है, दादी ने कहा जब मैं अमृतवेले योग में बैठी थी तो बाबा को पूछा बाबा यह शान्तिवन का काम किसको देवें तो बाबा ने आपका नाम बताया। यह बात सुनते ही मन आनन्द विभोर हो गया। दिल से आवाज निकली – ‘‘वाह मेरा भाग्य’’ स्वयं भगवान की नजर मुझ पर पड़ी इससे और ज्यादा सौभाग्य और किसका हो सकता है!
18 मार्च को निर्माण प्रारम्भ हुआ
उसके बाद दादी जी ने मुझे सोने का बैज पहना कर कहा – 18 तारीख को हाॅल का फाउण्डेशन स्टोन होगा। मैंने हां जी करके 18 तारीख को देश-विदेश तथा मधुबन निवासी व सभी वरिष्ठ दादियों व भाइयों के करकमलों द्वारा हाॅल का फाउण्डेशन स्टोन हुआ। 22 मार्च को अव्यक्त बापदादा ने कहा दिसम्बर में बापदादा इस हाॅल का उद्घाटन स्वयं अपने करकमलों द्वारा करेंगे। मुझे चिन्ता लगी यह कुछ सालों तक चलने वाला काम कुछ महीनों में ही कैसे होगा। लेकिन बा पतो त्रिकालदर्शी है, काम हुआ ही पड़ा है। इसलिए बाबा ने बोला जब मैं बाबा को सम्मुख मिलने गया तो मुझे अनुभव हो रहा था कि मैं बादलों के ऊपर चल रहा हूं। मेरे पैर धरती पर नहीं हैं। जैसे बाबा से दृष्टि लेता रहा तो अन्दर ही अन्दर आभास हुआ मेरी सब चिन्तायें जैसे की बाबा हर रहा है। दृष्टि देते हुए बाबा ने कहा –
‘हिम्मत और लगन को बढ़ाओ काम हो जायेगा।’ बस उसी क्षण ने मुझे निश्चित कर दिया। कंस्ट्रक्शन शुरू किया तब जैसे कि बाबा की मदद पल-पल अनुभव हो रही है। यह जीवन में पहली बार अनुभव किया कि ये काम बाबा स्वयं खड़े होकर मदद करा रहे हैं। मैं साक्षी होकर मदद कर रहा हूं। जहां-वहां सफलता ही सफलता मिलती है। इसलिए मैं बिल्कुल बेफिक्र बादशाह रहता हूं। जो अन्य भाई भी अनुभव करते हैं। उसके साथ-साथ ये सदा ध्यान में रखता हूं कि यज्ञ का एक पैसा भी व्यर्थ न जाये। कोई देखे ना देखे लेकिन बाबा तो ऊपर से मुझे सदैव देख ही रहा है। इसी अनुभव से कंस्ट्रक्शन को समय पर पूरा करने का प्रयास कर रहा हूं।

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